मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

उत्तरी कारो और कोयल चले इन नदियों से सटी दो रमणीक स्थानों पर... Kauvakhap and Garo, Jharkhand

पहाड़ी नदियों की भी अपनी एक विशिष्टता है। बरसात के दिनों में दो तीन दिन की तेज़ बारिश में उफन पड़ेंगी वहीं जाड़ों में दुबली पतली होकर हौले हौले इठलाती हुई बहती चलेंगी। गर्मी आते ही अपने बलुई छाती इस तरह खोल देंगी मानो उसके बीच पानी का कोई कतरा कभी रहा भी न हो।

ज़ाहिर सी बात है इन नदियों के आस पास रहने वाले लोग नवंबर से मार्च तक इन नदियों की इठलाती चाल के साथ कदम मिलाते हुए इनके पाटों के बीच सुकून तलाशते हैं। वैसे भी कहीं समतल तो कहीं चट्टानी इलाकों के बीच से उछलती कूदती या फिर थोड़ी थोड़ी ऊंचाई से गिरती इन नदियों को करीब से निहारना या फिर इनके उथले जल में लोट पोट होना भला किसे न भाएगा? तो चलिए आज लिए चलते हैं आपको झारखंड की दो प्रमुख नदियों के तटों पर जहां पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में जाना हुआ था।


यही वज़ह थी कि साल की शुरुआत में भीड़ भाड़ से दूर किसी सुरम्य स्थान की खोज करते हुए हम झारखंड की एक ऐसी नदी के आस पास चले गए जिसकी खूबसूरती रांची और उसके आस पास के जिले के लोगों को खूब लुभाती है। ये नदी थी उत्तरी कारो जो रांची जिले के पठारी इलाकों से निकल कर खूंटी  और गुमला जिलों को छूती हुई पश्चिमी सिंहभूम में जाकर दक्षिणी कोयल नदी से जाकर मिल जाती है। इस नदी में नंगे पैर पदयात्रा करने का पहला अनुभव मुझे तोरपा जाते वक़्त मिला था। इस बार इस नदी से मिलने के लिए हमारे समूह ने कौवा खाप को चुना। गोविंदपुर के निकट के इस स्थान का नाम ऐसा क्यों पड़ा ये तो मुझे नहीं मालूम पर इस रमणीक स्थल पर दूर दूर तक कौओं का नामो निशान न था।

कभी कभी संसार मोनोक्रोम (श्वेत श्याम) के चश्मे से देखकर कुछ ज्यादा शांत, ठहरा हुआ और थोड़ा रहस्यमय लगने लगता है। 

कौवा खाप में उत्तरी कारो नदी घने जंगलों के किनारे किनारे बहती हुई 180 डिग्री का घुमाव लेती है। 

Clockwise from left: घने जंगलों के अंदर,सूखे पत्तों की सुंदरता, जंगल के साथ घुमाव लेती नदी, जंगलों की ढलान ले जाती है यहां आपको नदी तक, नीले आसमान और हरियाली के बीच बहती कारो

यहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नदी के लगभग आधा एक किमी पहले ही खत्म हो जाती है। हालांकि कच्ची सड़क से नदी के बेहद करीब तक पहुंचा जा सकता है। जब मैं यहां मित्रों के साथ पहुंचा तो नदी के आस पास दो चार परिवार ही मौजूद थे। जंगल से लौट रही ग्रामीण स्त्रियों के लिए हमारा वहां आना कौतूहल का विषय था। मुस्कुराते हुए एक ने पूछ ही लिया कि यहां तो कोई आता नहीं आप कहां से आए हैं? दरअसल आम जनों में ये जगह उतनी मशहूर नहीं हुई इसीलिए इसकी स्वच्छता अभी भी बची हुई है। पर्यटक भले कम हों पर बालू का खनन करने वाले यहां खूब आते हैं।

Clockwise from left: नदी का पथरीला पाट, कच्ची सड़क से नदी की ओर जाता रास्ता, नदी पार कर दिखता जंगल

जंगल तक पहुंचने के लिए नदी को पार करना पड़ता है। यहां के जंगल काफी घने हैं और ज्यादा अंदर जाने पर गजराज से कभी भी सामना हो सकता है।   सुबह आठ नौ बजे तक यहां पहुंच कर सीधे नदी के छिछले जल में चलने का आनंद लेकर थोड़ा दिन चढ़ते ही इन जंगलों के बीच आप धूनी रमा सकते हैं। नदी की कलकल बहती धारा, जंगल में पत्तों की सरसराहट के अलावा यहां कोई और शोर नहीं है। अगर प्रकृति के बीच परम शांति के बीच आप अपना समय बिताना चाहें तो ये जगह आपको निश्चय ही पसंद आएगी। 


मुझे नहीं लगता कि भारत के किसी भी प्रदेश में किसी भी नदी का नाम किसी पक्षी के नाम पर हो पर झारखंड में एक ऐसी ही नदी है जिसका नाम है कोयल। मजे की बात है कि कोयल झारखंड का राजकीय पक्षी भी है। हालांकि निश्चित तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि इस नदी का नाम कोयल क्यों पड़ा? क्या इसके बहते जल की कलकल बोली इसे राज्य में यत्र तत्र सर्वत्र पाई जाने वाली कोयल की कूक से जोड़  गई या फिर इसके तटों के आस पास आदिम काल से रहने वाले कोल आदिवासियों के नाम पर इसका नाम कोल से कोयल हो गया। कारो नदी की तरह ही झारखंड में इस नाम की दो नदियां हैं उत्तरी कोयल और दक्षिणी कोयल।


तो उत्तरी कारो के तट से आपको लिए चलते हैं उत्तरी कोयल की ओर। ये नदी रांची से सटे गुमला जिले के पठारी इलाकों से निकल कर लातेहार, पलामू और गढ़वा जिले को छूती हुई झारखंड बिहार और छत्तीसगढ़ की सीमा के पास सोन नदी में मिल जाती है। जहां इसी के पचास सौ किमी के आस पास के इलाकों से निकलने वाली दक्षिणी कोयल, उत्तरी कारो और शंख नदियां दक्षिण की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी की ओर निकल जाती हैं वहीं उत्तरी कोयल लातेहार के पठारी इलाकों के पत्थर से भरे पाटों और दुर्गम जंगलों को चीरती हुई पलामू  और गढ़वा जिलों से होकर निकलती है। इन जिलों का शुमार झारखंड के सबसे शुष्क प्रदेशों में होता है और ये इलाके अक्सर पानी के लिए तरसते हैं। ऐसे में यहां के निवासियों के लिए उत्तरी कोयल और उसकी सहायक नदियां औरंगा और अमानत का महत्त्व कितना बढ़ जाता है आप समझ सकते हैं।

Clockwise from left: गारू के पास बहती उत्तरी कोयल नदी, गुलदार तितली (Common Leopard), नदी का हरा भरा तट, गारू पुल

झारखंड पर्यटन के दो प्रमुख आकर्षण नेतरहाट और बेतला राष्ट्रीय अभयारण्य जाते समय इस नदी से आपकी बार बार मुलाकात होती है। झारखंड का डाल्टनगंज तो खैर इस नदी के किनारे ही बसा हुआ है। कभी पलामू के किले पर चढ़ाई करेंगे तो उसके शीर्ष से आपको इसकी सहायक नदी औरंगा बहती दिखाई देगी। ये नदी बेतला नेशनल पार्क की उत्तरी सीमा निर्धारित करती है। बेतला के आगे जहां ये नदी कोयल से मिलती है उसे केचकी संगम के नाम से जाना जाता है।

इसके तो शर्बत का मौसम आने ही वाला है😋

बेतला से लौटते हुए मुझे भरी दुपहरी में और फिर सूर्यास्त की वेला में इस नदी के दो रूपों में दर्शन हुए। एक तो बेहद समतल तो दूसरा इसका पथरीला रूप। लातेहार के जंगलों से निकल  कई जलराशियां इस नदी में गिरती हैं पर जाड़ों में इसके चौड़े पाट को अगर आप चाहें तो पैदल पार कर सकते हैं। मुलायम बालू के बीच से बहती इसकी धाराएं छन कर बिल्कुल स्वच्छ हो जाती हैं और ऐसे में इसमें छप छपा छईं करना बेहद आनंददायक होता है।🙂

बेतला के जंगलों से गारू की ओर लौटते हुए इस नदी के तट पर कुछ समय बिताने का मौका मिला। नदी के निर्जन तट पर एक दो मछुआरे, कुछ फलदार वृक्ष और झाड़ियों के साथ ढेर सारी तितलियां हमारी संगी बनीं। 

Clockwise from left: घाघरा के पास उत्तरी कोयल का बेहद पथरीला पाट, मेरे सहयात्री, नारंगी से गुलाबी होती सूर्यास्त की आभा

घाघरा के पास जब दूसरी बार इस नदी से मुलाकात हुई तो शाम ढल चुकी थी। सूर्य किरणें दिन का अंतिम टाटा बाय बाय कहने के पहले नदी के जल पर बड़े प्रेम से नारंगी आभा बिखेर रही थीं। जैसे जैसे अंधेरा पसर रहा था नदी सकुचाती से इस स्पर्श से गुलाबी हुई जा रही थी।

कारो और कोयल से विदा लेते हुए कवि अखिलेश सिंह की ये पंक्तियाँ मुझे सहसा याद आ गयीं।

नदी से गुज़रते हुए

मुझे कभी नहीं लगा

कि नदी भी गुज़र गई

जबकि

हर चीज़ गुज़र ही जाती है

जिससे मैं गुज़रता हूँ

वह अपनी रह जाने की आदत के कारण

रह गई मुझमें

....................

नदी नहीं गुज़री

वह मेरे मन की रंगावट में

एक किनारी की तरह दर्ज है अब

मैं उसके पास जाता हूँ,

जब-जब चुप होता हूँ

मैं उसके पास नहीं जाता हूँ,

जब-जब मैं "मैं "नहीं होता हूँ

नदी को नहीं गुज़रने देना

मेरी भी क़ुव्वत है


ऐसा ही कुछ रिश्ता है मेरा और नदी का और आपका?


शुक्रवार, 27 मार्च 2026

गढ़ पंचकोट बंगाल में सप्ताहांत बिताने की एक सुरम्य जगह

गढ़ पंचकोट, ये नाम शायद ही आपने कभी सुना हो। सुनने से तो ऐसा लगता है कि यहां कोई विशाल सा किला रहा होगा। पर किले के नाम पर यहां सिर्फ 16 वीं शताब्दी में सिंहदेव वंश के शासनकाल में बनाए पक्की मिट्टी के कुछ मंदिर ही बचे हैं। 


वैसे अगर आपने बंगाल के प्रसिद्ध विष्णुपुर के मंदिरों को देखा हो तो वहां की स्थापत्य शैली बिल्कुल यहां के मंदिरों सरीखी दिखेगी। हालांकि ऐसा माना जाता है कि मल्ल शासकों द्वारा बनाए वो मंदिर 17 वीं शताब्दी में बने। इस हिसाब से गढ़ पंचकोट के मंदिर संभवतः उससे पचास सौ वर्ष पुराने रहे होंगे।


पंचेत बांध से निकलता पानी 

गढ़ पंचकोट का इलाका यहां स्थित पंचेत पहाड़ियों के उत्तर पूर्वी किनारे की तलहटी पर है। पास ही दामोदर नदी के पानी को रोककर बनाया गया पंचेत बांध है जो झारखंड और बंगाल की सीमा का काम करता है। यही वज़ह है कि पुरुलिया जिले में स्थित ये कस्बा यूं तो बंगाल में है पर इसका निकटवर्ती रेलवे स्टेशन कुमारधुबी झारखंड में है।

पंचेत की हरी भरी पहाड़ियां

गढ़ पंचकोट की खूबसूरती का मुख्य आकर्षण पंचेत की लगभग 450 मीटर ऊंची हरी भरी पहाड़ी और उससे सटे घने जंगल हैं। इन जंगलों के बीच से एक दुबला पतला रास्ता जाता है जिस पर सुबह सुबह चहलकदमी करना मन को बेहद सुकून देता है। इस रास्ते पर बेहद सुंदर रिसॉर्ट भी हैं। दुर्गापुर और धनबाद जैसे बड़े शहरों के पास होने के कारण मानसून और जाड़ों में यहां काफी लोग आते हैं।

रिजॉर्ट का मुख्य द्वार

बारिश में यहां के सुंदर तरणताल का आनंद नहीं ले पाए

गढ़ पंचकोट इको टूरिज्म का अहाता

रिजॉर्ट के अंदर एक छोटा मगर प्यारा सा मंदिर

पिछले साल अगस्त के महीने में मैं दुर्गापुर में था। सप्ताहांत की छुट्टियां थीं तो अचानक यहां जाने का कार्यक्रम बन गया। भरी दोपहरी में मैं जब यहां पहुंचा तो गाड़ी से उतरते ही ऐसी झमाझम बरसात शुरू हुई कि कमरे से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया। खुशकिस्मती बस इतनी थी कि बालकनी से ही पंचेत की पहाड़ियां अपना दिल खोलकर हमें दर्शन दे रही थीं। गर्मागर्म चाय और पकौड़ों के बीच तड़तड़ाती बारिश का आनंद लिया गया।

बारिश में बाल्कनी से दिखता दृश्य
बारिश के  बंद होने के इंतज़ार में थोड़ी पेट पूजा ही कर ली जाए

बादल छंटे तो पूर्णिमा का चांद अपनी झलक कुछ यूं दिखा गया

रात तक इंद्र देव ने अपनी सेना वापस बुला ली पर अंधेरे में जंगलों की ओर कौन निकलता? सुबह सुबह जब हम सब निकले तो मौसम साफ था। पक्षियों का कलरव शुरू हो चुका था। 

Clockwise from left लाजवंती, पीहू, कुमुदनी, स्याह वक्ष वाली फुदकी

कहीं पीहू तो कहीं काले सिर वाले पीलक की उपस्थिति नज़र आ रही थी। सतभाई स्याह पिद्दी के साथ सुर में सुर मिला रहे थे। कहीं तो जंगल एकदम से घना हो उठता तो कभी अचानक सड़क के दोनों ओर समतल भूमि आ जाती। एक ओर धान के खेतों का विस्तार था तो दूसरी और छोटे बड़े सरोवर ,कमल और कुमुदिनी की उपस्थिति से फूले नहीं समा रहे थे । 

जंगल का रास्ता और खेत खलिहान

तीन चार किमी चलने के बाद ये ख्याल आया कि अभी वापस भी लौटना है। धूप अब चढ़ चुकी थी और बारिश के बाद की उमस ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। पसीने पसीने होकर किसी तरह रुकते चलते हुए होटल पहुंचे और फिर दिन में पंचेत बांध से गुजरते हुए वापसी की राह ली।

दीवारों पर महाराष्ट्र की वरली चित्रकला, सड़क पर बिखरे quarzite पत्थर

पंचेत बांध और पीछे दिखती पहाड़ियां

अगर आपके पास एक दिन और समय हो तो जाड़ों के दिनों में आप पंचेत की पहाड़ियों के ऊपर तक की ट्रैकिंग भी कर सकते हैं।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

हवाई अड्डा है या कोई वाटिका चलिए मेरे साथ बैंगलोर के T2 टर्मिनल की सैर पर

पहली हवाई यात्रा का उत्साह अपने आप में अनूठा होता है। दो दशक पहले जब कोलकाता से अंडमान जाना हुआ था तबका रोमांच अब तक मन को पुलकित करता रहता है। 


पर जैसे जैसे घर और कार्यालय की जरूरतों की वज़ह से हवाई सफ़र निरंतर होने लगे उनका नयापन जाता रहा। हवाई अड्डों पर जाने का उत्साह रहता भी तो कैसे? वक़्त के साथ साथ Peak Hour में यात्रियों की भारी भीड़ ने कई अच्छे खासे एयरपोर्ट में अनुभव रेलवे स्टेशन से भी बदतर बना दिया।

टर्मिनल में घुसते ही आप पहुंच जाते हैं इस हरे भरे गलियारे में


दूसरी तरफ पिछले कुछ सालों में नए और विशाल एयरपोर्ट तो बने पर सारे के सारे लगभग एक ही तर्ज पर। एक सी छत की संरचना, एक से गलियारे , एक सी बैठने की जगह और रंगों का वही उदासीन करता संयोजन। 



ऐसे में जब पिछले साल मैं बैंगलोर के नए T2 टर्मिनल पहुंचा तो उसका रूप रंग देख के मन जुड़ गया। 


चार साल की मेहनत के बाद ये टर्मिनल 2022 के अंत में अपने इस रूप में आया। यहां प्रवेश करते हुए ही आपको लगेगा मानो एयरपोर्ट नहीं बल्कि आप एक उद्यान में प्रवेश कर गए हों। बैंगलोर वाटिकाओं की नगरी के रूप में जाना जाता है और इसीलिए इस टर्मिनल का स्वरूप ऐसा रखा गया।



प्रकृति को इस इमारत में करीब रखने के लिए जो लैंडस्केप यहां बनाया गया उसमें मुख्य भूमिका थी छत, खंभों और दीवारों में प्रयोग किए गए बांस की। यहां तक की छत से लटकते झाड़फानूस (जिसमें रोशनी के साथ पौधों को डाला गया है) और ACVS duct को भी यहां बांस से बनाया गया।

T2  पर बना हरा भरा भोजन कक्ष 

छत से लटकते बांस के झाड़फानूस 

AC Duct 


करीब दस हजार वर्ग मीटर में हरियाली को फैलाने के लिए दीवारों की बाहरी सतह पर फैले पौधों का इस्तेमाल किया गया। बैठने की जगहों के बीचों बीच पेड़ लगाए गए। इन पेड़ों की हरीतिमा बनी रहे उसके लिए बांस से बनी छत के बीच से पर्याप्त मात्रा में प्रकाश आने की व्यवस्था की गई।




एयरपोर्ट में प्रवेश करते ही एक लंबा सा गलियारा आता है जिसके दोनों ओर हरी भरी लताएं आपकी गलबहियां करने के लिए आतुर दिखती हैं। अचानक छत की ओर आपकी नज़र जाती है तो शंकु की शक्ल में बांस को लपेटी हुई लताओं में खिलते फूल आपको देख कर मुस्कुराते हैं। ये समझ लीजिए कि एक प्रकृति प्रेमी को आनंदित करने के लिए यहां बहुत कुछ है।





आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां तीन हजार से अधिक प्रजातियों के पौधों में दो सौ के करीब संकटग्रस्त प्रजातियां भी हैं। ताड़ के भी सौ से ज्यादा रूप आप यहां देख सकते हैं। और तो और यहां एक छोटा सा झरना भी है जो सुरक्षा जांच के बाद आपके सामने आ जाता है। 


प्रकृति तो इस एयरपोर्ट की मुख्य थीम है ही पर इसका एक हिस्सा कर्नाटक के इतिहास , सांस्कृतिक कलाओं और स्थापत्य से भी परिचय कराता है 


कठपुतली के नाम से सबसे पहला ध्यान राजस्थान पर जाता है पर कर्नाटक में भी कठपुतलियों का प्रयोग लोगों के मनोरंजन के लिए किया जाता रहा है। यही वज़ह है कि टर्मिनल पर जगह जगह पारम्परिक वेशभूषा में कठपुतलियां प्रदर्शित की गयी हैं। इन्हें बनाया है अनुपमा होस्केरे ने  इन कठपुतलियों में महिलाओं की भाव भंगिमाओं  द्वारा भारतीय नाट्यशास्त्रों के नवरसों  को दिखने की कोशिश की गयी है। 


कर्नाटक के उत्तरी सिरे पर एक ऐतिहासिक शहर है बीदर जो कभी बहमनी सल्तनत का मुख्य केंद्र हुआ करता था इसी जगह बिदरी कला विकसित हुई इसमें  मिश्र धातु की प्लेट को मिट्टी के साथ पका कर काले  रंग में लाया जाता हैं।  फिर  उस पर आकृतियों को उकेरा जाता है।  इस कला की मुख्य विशेषता ये है कि इन आकृतियों को चांदी के धागों से बनाया जाता है।  नीचे बिदरी कला से बने इस एक सर्किट बोर्ड  सरीखे इस शिल्प में बंगलौर के नक़्शे को दिखाया गया है जो शहर की हरीतिमा के साथ साथ उसके तकनीकी केंद्र होने का भी आभास देता है।  


हवाई अड्डे पर रखी गयी कलाकृतियाँ भी आगुन्तक का ध्यान अपनी और खींचती हैं। सरवनन परसुरमन का ये गोलाकार  शिल्प  वास्तव में एक बीज की परिकल्पना बनाया गया है।  बीज जब प्रस्फुटित होता है तो ये संरचना नीचे के चित्र की शक़्ल में आ जाती है। शिल्पकार प्रकृति के विभिन्न घटकों के आपसी संबंधों को तंतुओं के अंतरजाल के रूप में प्रदर्शित करते हैं। 



कर्नाटक का प्राचीन इतिहास हम्पी के विशाल शहर विजयनगर से जुड़ा है  इस शहर की सम्पन्नता और कला कौशल को आप आज भी हम्पी के खंडहरों में महसूस कर सकते हैं  ओडिशा के कलाकार मयाधर साहू ने अपने इस काष्ठ शिल्प के माध्यम से विजयनगर की सांस्कृतिक समृद्धि को उकेरने का प्रयास किया है  



तो आप जब कभी इस टर्मिनल पर पधारें तो कुछ समय इसकी प्राकृतिक खूबसूरती और इन सराहनीय शिल्पों  को निहारने के लिए जरूर रखें।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

हरियाली कर्नाटक की : चलिए मेरे साथ शिमोगा से बैंगलोर

कर्नाटक का एक जिला है शिमोगा। कभी जोग जलप्रपात की सैर करनी हो तो बैंगलोर से यहीं आना पड़ता है। पिछले महीने कार्यालय के काम से इस जिले में जाना पड़ा। वैसे तो शिमोगा में हवाई अड्डा है पर बैंगलोर से यहां आने जाने के लिए ट्रेन ज्यादा सुविधाजनक रहती है। 

सुपाड़ी के पंक्तिबद्ध वृक्ष

रेल यात्रा में ये दूरी तय करने में पांच साढ़े पांच घंटे लगते हैं और रेलगाड़ी तुमकूर, हासन और चिकमगलूर जिले के कुछ इलाकों को छूती हुई शिमोगा में प्रवेश कर जाती है। चिकमगलूर के बिदूर और कुदूरू इलाकों में नारियल और सुपाड़ी के बागान खेत खलिहानों और चरागाहों के साथ साथ चलते हैं। सुपारी के युवा ठिगने पेड़ों के पीछे नारियल की पंक्तिबद्ध कतार जय वीरू की जोड़ी जैसी लगती है और पूरी यात्रा में साथ न छोड़ती हुई नज़र आ रही थी। नारियल और सुपारी सरीखी व्यावसायिक फसलों की खेती ने इन इलाकों में जो सम्पन्नता लाई है वो यहां के ग्रामीण इलाकों में स्पष्ट झलकती है।

हासन जिले का एक सुंदर गांव

चिकमगलूर तो वैसे भी कर्नाटक में कुर्ग और सकलेशपुर सरीखा एक शानदार हिल स्टेशन है। हासन जिले के अरसीकेरे को पार करने के बाद तुमकूर की बारिश में धुली धुली पहाड़ियां मन को लुभाती हैं पर असली आनंद ट्रेन की खिड़कियों के मध्य में अचानक उभरते मंदारगिरी पर्वत के ऊपर के भव्य मंदिर को देख कर आता है। चोटी पर बने वृक्ष के नीचे जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा है। पहाड़ के नीचे एक झील भी है जहां लोग बाग सप्ताहांत में अक्सर बैंगलोर से पहुंचते हैं।

मंदारगिरि के ऊपर स्थित भव्य जैन मंदिर

दूर से पहाड़ पर दिखता वृक्ष एक बोधिवृक्ष की तरह दिखाई देता है पर आपको जान कर आश्चर्य होगा कि दक्षिण पूर्व कर्नाटक में मंदारगिरि पहाड़ की चोटी पर बना ये मंदिर बौद्ध मंदिर नहीं बल्कि एक जैन मंदिर है।

इसकी चोटी पर बारहवीं शताब्दी में बने चार जैन मंदिर हैं जिनमें एक प्रतिमाविहीन है जबकि बाकी के मंदिर तीर्थंकर पार्श्वनाथ,चंद्रप्रभा और सुपार्श्वनाथ को समर्पित हैं। इन मंदिर समूह के साथ यहां एक स्तूप भी है और पर्वत के समक्ष एक झील भी जो मानसून के समय इस जगह की सुंदरता और बढ़ा देती है। यहां तुमकूर या फिर बेंगलुरु से भी सहजता के साथ पहुंचा जा सकता है।

रामदेवरा बेट्टा

तुमकूर के निकट की एक पहाड़ी जो रामदेवरा बेट्टा के नाम से जानी जाती है। ये पहाड़ी गिद्धों की आश्रय स्थली है। इस पहाड़ी के ऊपर ट्रेक करके जाया जा सकता है, हालांकि ये इतना आसान ट्रेक भी नहीं है । तकरीबन ऊपर तक की सात किमी की दूरी को तय करने में साढ़े तीन घंटे लग जाते हैं।

तो आइए देखें इस रेलयात्रा में चलती ट्रेन से ली गई कुछ अन्य तस्वीरें 👇

घुमड़ते बादल और धरा पर पानी के चारों ओर बिखरी हरियाली

कर्नाटक की जानी पहचानी लाल मिट्टी



हरी भरी वसुंधरा के ऊपर स्याह बादलों का डेरा

नारियल वृक्षों की बहार 

सुपाड़ी के पंक्तिबद्ध पेड़, कुदूरू

नारियल के पेड़ों के बीच छुपा गांव


तुमकूर की पहाड़ियां