दुर्गा पूजा का पर्व भारत के पूर्वी प्रदेशों में खासा धूमधाम से मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल और खासकर कोलकाता की दुर्गा पूजा और कलात्मक पंडालों का डंका तो सारे देश में बजता रहा है। पर झारखंड के राँची की दुर्गा पूजा भी पूरे उत्साह और भव्यता से मनाई जाती है। यूँ तो राँची में हर साल दुरंगा पूजा में सैकड़ों पंडाल बनते हैं पर मैं आज आपको इस साल के दस सबसे खूबसूरत पंडालों की झाँकी पर ले चलूँगा।
1. बकरी बाजार पूजा पंडाल
चैतन्य महाप्रभु का जन्म लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व पश्चिम बंगाल के मायापुर में हुआ था जहां पर आज इस्कॉन का एक भव्य मंदिर है। इस बार का बकरी बाजार का पूजा पंडाल इसी मंदिर की संरचना से प्रेरित होकर बनाया गया है।
बकरी बाजार का पंडाल रांची के सबसे पुराने पंडालों में से एक माना जाता है। हर साल यहां बनने वाले पंडाल अपने विस्तार और भव्यता के लिए जाने जाते रहे हैं। यहां के पंडाल के बाहरी स्वरूप में रंगों का कुशल संयोजन तो होता ही है, साथ ही प्रकाश के शानदार इस्तेमाल से रात में पूरा पंडाल इस तरह जगमगाता उठता है कि देखने वाला एक ही नज़र में पूरे दृश्य का कायल हो जाता है।
पंडाल में पर्याप्त जगह होने की वजह से लोग यहां के तरह-तरह के झूलों का भी खानपान के साथ खूब आनंद उठाते हैं। अगर रांची की जनता के अंदर के उत्साह को आप महसूस करना चाहते हैं तो बकरी बाजार के आसपास की गलियों से आपको एक बार तो गुजरना ही होगा।
मैं इस पंडाल में शाम के ठीक पहले पहुंचा ताकि दिन की ढलती रोशनी और रात के अलग-अलग दृश्य को एक साथ दिखला सकूं। आकाश के बदलते रंगों के साथ इस पंडाल की छवियों को कैद करना मेरे लिए एक बेहद सुखद एहसास रहा। शायद यही सुकून इन चित्रों को देखने के बाद आपके मन में भी तारी हो
रात में जगमगाता मायापुर के मंदिर का प्रतिरूप
2. रांची रेलवे स्टेशन पूजा पंडाल
रांची के भव्य पंडालों में पिछले कुछ वर्षों में रेलवे स्टेशन का पंडाल कलात्मकता की दृष्टि से बकरी बाजार के पंडाल को पीछे छोड़ता आया है।
मां का मंडप और दीवार की आंतरिक साज-सज्जा मन को मोहती तो है पर इस बार का पंडाल अपने पिछले रूपों की तुलना में थोड़ा फीका जरूर पड़ा है। फिर भी रांची के पंडालों में इस साल भी इसका बोलबाला तो जरूर रहेगा। तो आइए मेरे साथ देखिए इस पंडाल की कुछ छवियां
3. रातू रोड पूजा पंडाल
जितने भी आदिवासी बहुल राज्य हैं वहां बांस की कारीगरी खास तो होती ही है। झारखंड के कारीगर भी इस हुनर में पारंगत हैं। लकड़ी और बांस की सहायता से बना रांची का रातू रोड का पंडाल उनकी इसी कला को दर्शाता है। ये पंडाल रांची के पांच प्रमुख पंडालों में हर साल अपनी जगह बनाता आया है।
पूरे पंडाल में बांस से बनी वस्तुओं से सजावट की गई थी , साथ ही उन प्रतीक चिन्हों को दिखाया गया था जो आदिवासी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं।
4. हरमू पंच मंदिर दुर्गा पूजा पंडाल
कोरोना ने पिछले दो सालों में बच्चों को घर के अंदर बंद कर दिया था। मजबूरी में बच्चों को उनके दोस्तों और स्कूल से यूं अलग कर देना अभिभावकों के लिए भी बेहद पीड़ादायक था। पर आज जब हम कोरोना के दंश से लगभग मुक्त हो गए हैं तो जरूरी है कि हम बच्चों की जीवन शैली को वापस उसी दिशा में मोड़ें। उन्हें बाहर जाने, घुलने मिलने और सबके साथ खेलने के लिए प्रेरित करें।
दुर्गा मां का मंडप पतंग, फुटबाल, हाकी स्टिक, शटल कॉर्क जैसी तमाम खेल सामग्री से सजाया गया था । साथ ही समूह में खेलते हुए बच्चों की छवियां भी उकेरी गई थीं । बाजार ने भी बाहर, बच्चों को आकर्षित करते इस पंडाल के मुताबिक खिलौनों, गुब्बारों, चर्खियों की छटा बिखेर रखी थी जिसे देखकर मन होता है कि एक बार फिर अपने बचपन की और लौटा जाए।
नेत्र दान महादान इस थीम पर बना बिहार क्लब का पंडाल मन को छू गया। उत्सव के इस माहौल में कला के प्रदर्शन के साथ साथ कोई जरूरी सामाजिक संदेश भी रहे तो वो लोगों पर अपना असर जरूर छोड़ता है।
बिना आंखों की ज्योति के मन का अंधेरा गहराता जाता है। ऐसे में मनुष्य सुन कर या टटोल कर ही उस कालिमा को मिटाने की कोशिश करता है। पंडाल के ठीक सामने एक चेहरे की बंद आंखों के साथ अन्य प्रतीकों के माध्यम से यही कहने की चेष्टा की गई थी। कागज़ के पन्नों को काट कर कई चित्र बनाए गए हैं जो दुर्गा माता की कृपा से किसी की आंखों की रोशनी वापस लौटने की कथा कह रहे थे। कुल मिलाकर ये पंडाल कलात्मकता के साथ अपनी बात पुरज़ोर ढंग से रखने में सफल हुआ।
मुखौटों के देश में ...
चंद्रशेखर आजाद क्लब के सामने एक खोमचे वाला एकटक इन मुखौटों की ओर देख कर चमत्कृत हो रहा था। अचानक पलट कर वो चमकती हुई आंखों से मेरी तरफ मुखातिब हुआ और पूछ बैठा ...एक नंबर का पंडाल है ना? मेरा उत्तर देना ना देना बेमानी था। निर्णय वो ले ही चुका था।
सच तो यह है कि कला की अपनी ही भाषा होती है जिसकी लिपि संवेदना के तारों से लिखी जाती है और इन तारों की झंकार उसके मन तक पहुंच चुकी थी।
रांची के बांग्ला स्कूल में लगने वाला OCC क्लब का पंडाल हमेशा से अपनी महीन कारीगरी के लिए मशहूर रहा है। इस बार जूट से बने पंडाल का स्वरूप बेहद सौम्य था । दीवारों के बीच खड़े शिल्प भी अपना ध्यान खींचते हैं। दुर्गा मां की प्रतिमा का मुख मंडल बांग्ला शैली के अनुरूप थी ।
महाअष्टमी की शाम हमारा शहर पानी से सराबोर हो गया। याद नहीं आता मैं कभी इतना भीगा हूंगा। अब सारे सुंदर पंडालों को देखने का लालच जो न कराए। रांची के मशहूर रातू रोड के दुर्गा मंडप को देख कर लौट ही रहा था कि बूंदा बांदी मूसलाधार वर्षा में बदल गई। स्कूटर रोक आनन फानन में बरसाती पहनी और निकल लिए तेज लड़ी के साथ। घर अभी भी आठ किमी दूर था।
यहाँ बाँस से बना मुखौटा आकर्षण का के्द्र था।
10.राजस्थान मित्र मंडल
यहाँ सजा था स्वर्ग और नरक का दरबार
आशा है मेरे साथ दुर्गा पूजा की ये पंडाल परिक्रमा आपको पसंद आई होगी और आप झारखंड की उत्सवधर्मिता और कला प्रेम से परिचित हुए होंगे। भविष्य में इस ब्लॉग पर नई पोस्ट की सूचना पाने के लिए सब्सक्राइब करें।
सभी पंडाल बहुत ही सुन्दर हैं मनीष जी । मुझे बहुत पसन्द आये।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद प्रतिमा, जान कर खुशी हुई। 😊🙏
हटाएंसभी पंडालों में झारखंड की पारंपरिक कला-संस्कृति की की झलकियां बेहद पसंद आईं!!☺️
जवाब देंहटाएं😊😊
हटाएंप्रकृति संस्कृति साहित्य पर्यटन के नए-नए पहलुओं से अवगत कराने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
जवाब देंहटाएंसफ़र में साथ बने रहने का शुक्रिया।
हटाएंबहुत ही सुंदर तस्वीरें। आपके माध्यम से हमें भी इतने शानदार पंडाल देखने का मौका मिला। धन्यवाद 😊
जवाब देंहटाएं🙂🙂
हटाएंराँची के सारे पंडाल दर्शन कराने के लिए असंख्य धन्यवाद ।
जवाब देंहटाएंपुरानी यादें ताज़ा हो गई होंगी 😃
हटाएंThanks for showing us the pandals of Ranchi.
जवाब देंहटाएंMy pleasure 😊
हटाएंये सब दृश्यावलियां तो मनीष जी के ही ब्लाग पर ही मिल सकते है, और फिल्मांकन में आप सिद्धहस्त हैं।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद !
हटाएंअति उत्तम मनीष जी
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